काठमांडू, 27 मई। नेपाल में पिछले साल हुए 'जेन जी विद्रोह' को लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने बुधवार को रिपोर्ट सार्वजनिक कर दी है। इस रिपोर्ट के सार्वजनिक होने के साथ ही नेपाल की राजनीति में भूचाल आ गया है। रिपोर्ट में कई पूर्व और वर्तमान नेताओं, सुरक्षा निकायों तथा राजनीतिक दलों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। पूरी रिपोर्ट में प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया गया है, जिसको लेकर राजनीतिक हलकों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।
रिपोर्ट में पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और पूर्व गृहमंत्री रमेश लेखक पर पांच वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने तथा विदेश यात्रा पर रोक लगाने की सिफारिश की गई है। आयोग ने दोनों पर मानवाधिकार उल्लंघन और प्रशासनिक दुरुपयोग से जुड़े आरोपों की गहन जांच की आवश्यकता बताई है। इसी प्रकार, नेपाल में सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेने वाले तत्कालीन संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरूंग के खिलाफ भी कार्रवाई की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करने वाले निर्णयों ने स्थिति को और अधिक तनावपूर्ण बनाया।
रिपोर्ट में 'जेन जी विद्रोह' की आड़ में हुई जेल ब्रेक की घटना को गंभीर आपराधिक प्रकरण बताते हुए सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष को दोषी ठहराया गया है। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रवि लामिछाने के खिलाफ फौजदारी मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है। आयोग ने यह भी कहा है कि आरएसपी के सांसद मनीष झा और हरि ढकाल भी जेल ब्रेक प्रकरण में संलिप्त पाए गए हैं और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए। ये दोनों नेता ही रवि लामिछाने को जेल से छुड़ाने के लिए वहां पहुंचे थे और इन दोनों ने ही बाकी कैदियों की रिहाई के लिए भीड़ को उकसाया था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि 'जेन जी विद्रोह' के दूसरे दिन देशभर में हुई आगजनी और हिंसात्मक घटनाओं को रोकने में सुरक्षा निकाय विफल रहे। इसके लिए नेपाली सेना, नेपाल पुलिस और सशस्त्र प्रहरी बल तथा गुप्तचर विभाग के प्रमुखों को दोषी माना है। रिपोर्ट में नेपाल पुलिस के वर्तमान प्रमुख आईजीपी दान बहादुर कार्की, सशस्त्र प्रहरी बल के वर्तमान आईजीपी नारायण दत्त पौडेल को जिम्मेदार ठहराते हुए विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में पुलिस तथा गुप्तचर विभाग के तत्कालीन प्रमुखों को भविष्य में किसी भी सरकारी नियुक्ति के लिए अयोग्य घोषित करने की अनुशंसा की गई है। आयोग ने कहा कि संवेदनशील परिस्थितियों में खुफिया और सुरक्षा तंत्र पूरी तरह विफल साबित हुआ।
रिपोर्ट में नेपाली सेना की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। आयोग ने कहा है कि सेना की कुछ गतिविधियां “शंकास्पद” प्रतीत हुईं और भविष्य में संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहकर कार्य करने की नसीहत दी गई है। आयोग ने अंतरिम सरकार की प्रधानमंत्री सुशीला कार्की और उनके तत्कालीन गृहमंत्री ओम प्रकाश अर्याल की भूमिका को भी संदिग्ध बताते हुए विस्तृत जांच की सिफारिश की है। पूर्व गृहमंत्री सुदन गुरूंग सहित जेन जी प्रदर्शन का आह्वान करने वाले विभिन्न नेताओं के खिलाफ भी जांच की अनुशंसा की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि आंदोलन के दौरान कई नेताओं के भाषण और गतिविधियां हिंसा भड़काने वाली थीं।
इसके अलावा, आगजनी, तोड़फोड़ और भड़काऊ भाषण देने के आरोप में आरएसपी के 15 सांसदों के खिलाफ जांच की सिफारिश की गई है। आयोग का कहना है कि कुछ जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक वक्तव्यों ने हिंसक भीड़ को उकसाने का काम किया। इसके साथ ही रिपोर्ट में टीओबी नामक समूह पर पुलिस के खिलाफ भीड़ को भड़काने और सुरक्षा निकायों के प्रति अविश्वास फैलाने का आरोप लगाया गया है। तिब्बत ओरिजिन ब्लड (टी ओ बी) की टीशर्ट और जैकेट पहने कुछ संदिग्ध युवा जेन जी प्रदर्शन के दौरान अचानक प्रवेश किया और उसी के बाद पुलिस के तरफ से गोली चलाई गई थी।
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जेन जी विद्रोह पर एनएचआरसी की रिपोर्ट सार्वजनिक, नेपाल की राजनीतिक में भूचाल








